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बिहार में जिस तरह से भाजपा ने महागठबंधन को तोड़कर नीतीश कुमार को अपने खेमे में खींच लिया, उसके बाद ओडिशा में यह सवाल हर किसी की ज़ुबान पर है.

बिहार और ओडिशा की स्थिति में फर्क सिर्फ इतना है कि वहां नीतीश को भाजपा से दोबारा गठबंधन बनाने के लिए महागठबंधन तोड़ना पड़ा जबकि यहां नवीन को ऐसा कुछ करने की ज़रूरत नहीं है.नवीन पटनायक सरकार में सबसे वरिष्ठ मंत्री और बीजद के उपाध्यक्ष डॉ दामोदर राउत तक ऐसी सम्भावना से स्पष्ट शब्दों में इंकार नहीं कर रहे.उन्होंने कहा, "भविष्य में नवीन पटनायक इस बारे में क्या निर्णय लेंगे, यह कहना मेरे लिए संभव नहीं है. हमारी पार्टी में कोई आला कमान नहीं है. नवीन पटनायक ही हमारे आला कमान हैं. उस समय परिस्थितियां कैसी होंगी और वे क्या निर्णय लेंगे, अभी से कहना मुनासिब नहीं होगा."

भाजपा और बीजद के बीच समझौते के चर्चे बिहार में तख्तापलट के बाद गर्म ज़रूर हुए हैं. लेकिन दोनों पार्टियों की घटती दूरियों के बारे में अटकलबाज़ी तभी से शुरू हो गई थी जब एनडीए द्वारा राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के रूप में रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा होने के दो घंटों के अंदर नवीन ने उनके लिए समर्थन की घोषणा कर दी थी. महत्वपूर्ण बात यह है की इन दो घंटों में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने नवीन से फ़ोन पर बात भी की. हालाँकि उपराष्ट्रपति चुनाव में यूपीए के उम्मीदवार और अपने मित्र गोपाल गाँधी को समर्थन देकर नवीन पटनायक ने अपनी 'कांग्रेस और भाजपा से सामान दूरी' नीति पर कायम रहने का दावा भी किया . लेकिन यहां भी उनके कुछ सांसदों की भूमिका संदेहास्पद रही. माना जा रहा है कि एनडीए के उम्मीदवार वेंकैया नायडू को जो 21 वोट अधिक मिले उसमें से कुछ बीजद के थे. शीर्ष स्तर पर दोनों पार्टियों के बीच नज़दीक आने के आसार ज़रूर नज़र आ रहे हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर नज़ारा कुछ और ही है. पिछले फ़रवरी में राज्य में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में अप्रत्याशित सफलता के बाद से भाजपा ने नवीन सरकार और बीजद के प्रति काफ़ी आक्रामक रवैया अपना रखा है. शायद ही कोई एक दिन जाता है जब भाजपा ने नवीन सरकार या बीजद पर निशाना न साधा हो. गांव गांव में भाजपा और बीजद के कार्यकर्ता भिड़े हुए हैं. ऐसा कर भाजपा शायद यह साबित करना चाहती है कि 2019 में सत्ता में आने को लेकर पार्टी काफी गंभीर है. पिछले महीने अपने तीन दिन के ओडिशा दौरे में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दावा किया कि उनकी पार्टी विधान सभा के 147 में से 120 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाएगी. ऐसे में यह स्वाभाविक है कि बीजद के साथ किसी तरह के समझौते की सम्भावना से भाजपा नेता इंकार कर रहे हैं. केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री और मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा के अघोषित उम्मीदवार धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं, "हमें ऐसी कोई आवश्यकता लगती नहीं है. एक भ्रष्ट व्यवस्था के साथ समझौते की नौबत हमें ओडिशा के लोग नहीं देंगे." लेकिन 120 सीटें हासिल करने के दावे का आधार क्या है जबकि हाल में हुए सभी जिला परिषद् उपचुनाव में बीजद जीती है, तो उनका कहना था, "चुनाव गणित से नहीं, केमिस्ट्री से जीती जाती है." लेकिन अकेले 120 सीटें हासिल करने का भाजपा के दावे का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है. जानकार बताते हैं कि अगर पार्टी 74 सीटें भी निकाल ले तो उसके लिए बहुत होगा. दूसरी तरफ नवीन पटनायक भी समझ चुके हैं कि इस समय उनकी पार्टी की स्थिति वह नहीं है जो 2014 के चुनाव के समय थी. इन तीन सालों में पार्टी और वे खुद काफी कमज़ोर हुए हैं. पार्टी के अंदर गुटबाज़ी बढ़ी है तो पार्टी पर उनकी पकड़ ढीली हुई है. उन्हें यह भी पता है कि कुछ सांसदों सहित पार्टी के कुछ नेता भाजपा से संपर्क बनाए हुए हैं और कभी भी छलांग लगा सकते हैं. नवीन के स्वास्थ्य को लेकर अटकलबाज़ी का बाजार भी गर्म है.ऐसे में अपने दमखम पर लगातार पांचवीं बार सत्ता में आने के बारे में वे पूरी तरह से आश्वस्त नहीं दिखते.

बीजेपी की रणनीति

नवीन के लिए एक समस्या यह भी है कि मोदी सरकार किसी भी समय चिट फण्ड घोटाले को फिर खोल सकती है और नवीन की सरकार और पार्टी दोनों के लिए समस्या खड़ी कर सकती है.यही नहीं, मोदी सरकार चाहे तो जस्टिस एमबी शाह कमीशन के रिपोर्ट के आधार पर हज़ारों करोड़ के खनिज घोटाले की भी सीबीआई जांच के आदेश देकर नवीन की नींदें हराम कर सकती है.यही कारण है कि ममता बनर्जी की तरह मोदी का सम्पूर्ण और कड़ा विरोध करने के बजाय नवीन ने शुरू से ही उनके साथ 'ब्लो हॉट, ब्लो कोल्ड' का रिश्ता बनाए रखा है.एक तरफ जहाँ पार्टी के अन्य नेता और प्रवक्ता आए दिन मोदी सरकार को लताड़ते रहे हैं वहीं खुद नवीन ने नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक और और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर मोदी सरकार को खुलकर समर्थन किया है.इस प्रकार आपस में सुलह करने की दोनों ही प्रमुख पार्टयों की अपनी अपनी मज़बूरियां हैं. प्रेक्षकों का मानना है कि भाजपा की ओर से रोज़ के आक्रमण और दवाव बनाये जाने का असली मक़सद राज्य में अपनी सरकार बनाना नहीं, बल्कि नवीन और बीजद को समझौते के टेबल पर आने पर मज़बूर करना है.



Author : Super

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