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' ज़ालिम ' अगस्त भाजपा के लिए 'खट्टरनाक' रहा .

सवा तीन साल में अगस्त शायद पहला महीना होगा जब टीवी चैनलों पर भाजपा के प्रवक्ता ठंडे-मीठे दिखे, कई बार तो दिखे ही नहीं.

मोदी के पीएम बनने के बाद से अब तक सिर्फ़ दो महीने सत्ता पक्ष के लिए अशुभ रहे हैं, फ़रवरी 2015 और नवंबर 2015, जब पार्टी दिल्ली और बिहार के चुनाव बुरी तरह हारी.

मगर जल्दी ही इन दोनों पराजयों को बुरे सपने की तरह भुलाकर बीजेपी तेज़ गति से आगे बढ़ी.

पहली नज़र में अलोकप्रिय दिखने वाले नोटबंदी के फ़ैसले को मोदी के करिश्मे ने राजनीतिक पूंजी में बदल दिया, सर्जिकल स्ट्राइक  का सीमा पार न जाने क्या असर हुआ, लेकिन देश के भीतर पार्टी का आत्मविश्वास आसमान छूने लगा.

ये अलग बात है कि नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक का ब्यौरा देश को आज तक नहीं दिया गया.

 

2017 में यूपी, उत्तराखंड में मिली जीत, और फिर गोवा, मणिपुर में कांग्रेस से पिछड़कर भी सत्ता हथियाने का चमत्कार करने के बाद, बीजेपी के नेताओं ने ख़ुद को अजेय घोषित कर दिया. 2019 की जीत पक्की मानकर, 2024 के चुनाव की चर्चा होने लगी.

यहाँ तक कि मोदी लाल क़िले से 2022 तक 'न्यू इंडिया' बनाने का ऐलान करने लगे जबकि उनका मौजूदा कार्यकाल 2019 तक ही है.

शायद तब उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि अभी वे 'ओल्ड इंडिया' में ही रह रहे हैं जहाँ उन्हें झटका देने के पर्याप्त इंतज़ाम मौजूद हैं.

'ओल्ड इंडिया' ने बीजेपी को महीने का पहला झटका दिया हरियाणा में, जहाँ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के सुभाष बराला के पुत्र विकास बराला ने किरकिरी कराई, आख़िरकार उनकी गिरफ्तारी हुई लेकिन छवि का जितना नुक़सान होना था, हो गया.

बीजेपी के नारे 'बेटी बचाओ' की भरपूर पैरोडी बनी.

अभी मुश्किल से दो दिन बीते होंगे कि गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में बच्चों की भयावह मौत की ख़बर आ गई, इसके बाद सरकार को ख़ासी फज़ीहत का सामना करना पड़ा, लंबे समय तक प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष या मुख्यमंत्री ने इस दुखद घटना पर संवेदना तक प्रकट नहीं की.

जले पर नमक छिड़का राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने, उन्होंने कहा कि "अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं."

 

तीसरा बड़ा झटका :

गोरखपुर में बच्चों की मौत पहले भी होती रही है लेकिन इस बार बीजेपी इन आरोपों को नहीं झुठला सकी कि उसका रवैया इस मामले में गैर-ज़िम्मेदाराना और असंवेदनशील था.

बीजेपी को तीसरा बड़ा झटका अगस्त महीने में पहले दस दिन के भीतर ही लग गया जब पार्टी ने गुजरात से कांग्रेस के नेता अहमद पटेल को राज्यसभा में जाने से रोकने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया.

ये बात किसी से छिपी नहीं थी कि बीजेपी अमित शाह और स्मृति ईरानी को जिताने से ज़्यादा, पटेल को हराने के लिए दम लगा रही थी.

भारी हंगामे और देर रात चले नाटक के बाद, चुनाव आयोग ने अहमद पटेल को विजेता घोषित कर दिया और बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी.

 

खतौली रेल हादसा :

अगस्त महीने ने न जाने क्यों बीजेपी की गाड़ी पटरी से उतारने की ठान ली थी, खतौली की रेल दुर्घटना और उसके बाद सामने आए तथ्यों ने पार्टी प्रवक्ताओं को मुसीबत में डाल दिया, पता चला कि पटरी पर काम चल रहा था कि ड्राइवर को इसकी सूचना नहीं दी गई थी.

शिव सेना से बीजेपी में आए सुरेश प्रभु ने ट्विटर के ज़रिए कार्यकुशल रेल मंत्री की जो छवि बनाई थी वो पूरी तरह धुल गई जब चार दिनों के भीतर उत्तर प्रदेश के औरेया में कैफ़ियत एक्सप्रेस के 10 डिब्बे पटरी से उतर गए, रेलवे बोर्ड के चेयरमैन एके मित्तल के इस्तीफ़ा दे देने के बाद प्रभु पर दबाव और बढ़ा.

उन्होंने इस्तीफ़ा तो नहीं दिया, लेकिन लंबी-चौड़ी भूमिका के साथ इस्तीफ़े की पेशकश की जिस पर पीएम मोदी ने कहा कि "अभी इंतज़ार करिए." लेकिन बुलेट ट्रेन चलाने का दावा करने वाली सरकार की छवि पर जितना बड़ा धब्बा लगना था, वो तो लग ही गया.

तीन तलाक पर फैसला :

अगस्त के महीने में बीजेपी का उत्साह सिर्फ़ तीन तलाक़ के मामले पर आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद दिखा, प्रधानमंत्री समेत हर छोटे-बड़े नेता ने "मुसलमान महिलाओं को इंसाफ़ मिलने पर" बढ़-चढ़कर बधाई दी, मानो ये अदालत का नहीं, सरकार का फ़ैसला हो.

मगर ये ख़ुशी ज्यादा देर तक टिक नहीं पाई, सुप्रीम कोर्ट ने जल्द ही झटका दे दिया, नौ जजों की बेंच ने 'निजता के अधिकार' पर ऐसा फ़ैसला सुनाया जो सरकार की तमाम दलीलों के उलट था, तत्कालीन एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी सरकार की तरफ़ से यहाँ तक कह चुके थे कि "इंसान का अपने शरीर पर भी पूर्ण अधिकार नहीं है".

इसके बाद केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने शर्मिंदगी छिपाने की कोशिश करते हुए कहा कि "फ़ैसला हमारी सरकार के रवैए को सही साबित करता है कि निजता मौलिक अधिकार है" लेकिन मुकुल रोहतगी ने उन्हें शर्मसार कर दिया, उन्होंने बार-बार और साफ़-साफ़ कहा कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट में हार का सामना करना पड़ा है.

 

बाबा की कृपा और खट्टर  :

राम रहीम को दोषी करार दिए जाने से पहले जमा हुई भीड़, उसके बाद भड़की हिंसा, खट्टर सरकार का रवैया और भारी दबाव के बावजूद बीजेपी का उन्हें कुर्सी पर बिठाए रखना, ये सब इस तरह हुआ कि पार्टी का बड़े से बड़ा समर्थक बचाव करने के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं कर सका.

बाबा का आशीर्वाद पाने के इच्छुक लगभग सभी राजनीतिक दल रहे हैं लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में बाबा ने बीजेपी को घोषित तौर पर समर्थन दिया था, इसलिए बीजेपी आसानी से पिंड नहीं छुड़ा पा रही है.

इस मामले में अगर बाबा विलेन नंबर वन हैं, लेकिन खट्टर के प्रति लोगों में बाबा के मुक़ाबले थोड़ा ही कम ग़ुस्सा है, बीजेपी सिर्फ़ वक़्त गुज़रने का इंतज़ार कर सकती है.

गांधी मैदान की रैली :

सियासी तौर पर 18 विपक्षी दलों की लालू-शरद यादव की पटना की महारैली एक ऐसी घटना है जिसने बीजेपी को चिंतित ज़रूर किया होगा, हालांकि मायावती इससे दूर रहीं, राहुल गांधी ऐन मौके पर विदेश चले गए, फिर भी गांधी मैदान का बड़ा हिस्सा हाल के वर्षों में कोई और नेता इस तरह नहीं भर पाया है.

इतना ही नहीं, दिल्ली में अगले चुनाव में केजरीवाल के सफ़ाये का दावा करने वाली बीजेपी को विधानसभा उप-चुनाव में बवाना सीट पर हार का मुंह देखना पड़ा है.

विश्वविद्यालयों में संस्कृत और योग के साथ ज्योतिष पढ़ाने की सिफ़ारिश करने वाले पार्टी के कई नेता ज़रूर ग्रह दोष शांति के लिए यज्ञ, हवन, दान आदि के बारे में सोच रहे होंगे.

इस महीने कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनसे बीजेपी की छवि को गहरा धक्का पहुंचा है, टीवी बहसों में आक्रामकता दिखाने की गुंजाइश पूरे महीने उसे नहीं मिली है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि हमेशा ऐसा ही रहेगा, बीजेपी इससे बड़े संकटों से उबरती रही है, और विपक्ष अब भी मूर्छित ही है.

देशभक्ति, पाकिस्तान, मुसलमान, वंदे मातरम, गौ माता, जेएनयू में टैंक, हिंदू राष्ट्रवाद, लव जिहाद और मंदिर निर्माण जैसे मुद्दों पर बीजेपी के पास एक रटा-रटाया पाठ है लेकिन अगस्त के महीने ने उससे ऐसे बहुत सारे सवाल पूछे हैं जो उनके मौजूदा सिलेबस में नहीं हैं.


 



Author : Super

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